वैश्विक स्तर पर गिरती भारतीय पत्रकारिता चिंताजनक ? - रवीन्द्र त्रिपाठी
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🔴 पत्रकारिता दिवस पर विशेष।
कभी लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाने वाली भारतीय पत्रकारिता आज वैश्विक स्तर पर गंभीर बहस और चिंता का विषय बनती जा रही है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जिस पत्रकारिता ने जनजागरण का कार्य किया, वही आज सत्ता, कॉर्पोरेट दबाव, टीआरपी की होड़ और डिजिटल प्रोपेगेंडा के बीच अपनी विश्वसनीयता खोती दिखाई दे रही है।
अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं समय-समय पर भारत में प्रेस की स्वतंत्रता, पत्रकारों की सुरक्षा और मीडिया की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठाती रही हैं। लोकतंत्र की मजबूती का आधार स्वतंत्र मीडिया को माना जाता है, लेकिन जब मीडिया का बड़ा हिस्सा निष्पक्ष सूचना के बजाय राजनीतिक ध्रुवीकरण और सनसनी पर केंद्रित हो जाए, तब यह केवल देश ही नहीं, बल्कि वैश्विक लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए भी चिंता का विषय बन जाता है।
गिरते स्तर के प्रमुख कारण
भारतीय पत्रकारिता के गिरते स्तर के पीछे कई कारण जिम्मेदार माने जा रहे हैं। इनमें सबसे प्रमुख टीआरपी और सनसनी की दौड़ है। समाचारों का उद्देश्य कभी जनहित और तथ्य आधारित जानकारी देना था, लेकिन अब कई मंचों पर “पहले दिखाओ, चाहे अधूरा दिखाओ” की प्रवृत्ति बढ़ी है।
टीवी बहसों में तथ्य कम और शोर अधिक दिखाई देता है। संवेदनशील मुद्दों को मनोरंजन की तरह प्रस्तुत किया जाता है। डर, नफरत और भावनात्मक उकसावे पर आधारित सामग्री तेजी से बढ़ रही है।
इसके अलावा मीडिया संस्थानों पर कॉर्पोरेट और राजनीतिक प्रभाव के आरोप भी लगातार लगते रहे हैं। बड़े उद्योग समूहों और राजनीतिक हितों से जुड़ाव के कारण निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न खड़े होते हैं। विज्ञापन आधारित निर्भरता और सत्ता के पक्ष या विपक्ष में खुला झुकाव भी मीडिया की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है।
फेक न्यूज़ और डिजिटल प्रोपेगेंडा
सोशल मीडिया ने सूचना के प्रसार को तेज जरूर किया है, लेकिन सत्यापन की प्रक्रिया कमजोर हुई है। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी, ट्रोल संस्कृति और आईटी सेल आधारित नैरेटिव युद्ध ने आधी-अधूरी खबरों को तेजी से वायरल करने का रास्ता खोल दिया है।
पत्रकारों को धमकियों, मुकदमों और सामाजिक हमलों का सामना करना पड़ता है, जिससे स्वतंत्र रिपोर्टिंग प्रभावित होती है। वहीं टीवी डिबेट में शालीन संवाद के स्थान पर आरोप-प्रत्यारोप और उत्तेजक भाषा आम होती जा रही है। इससे पत्रकारिता की गरिमा को भी ठेस पहुंची है।
वैश्विक स्तर पर प्रभाव
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। ऐसे में यहां मीडिया की स्वतंत्रता कमजोर पड़ने का असर वैश्विक लोकतांत्रिक विमर्श पर भी पड़ता है। कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं प्रेस स्वतंत्रता रैंकिंग में भारत की गिरती स्थिति पर चिंता व्यक्त कर चुकी हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की लोकतांत्रिक छवि प्रभावित होती है।
सूचना व्यवस्था पर भरोसा कमजोर होने से अंतरराष्ट्रीय निवेशकों और संस्थाओं के बीच भी पारदर्शिता को लेकर सवाल उठते हैं। यदि मीडिया निष्पक्ष मध्यस्थ की जगह राजनीतिक हथियार बन जाए, तो समाज में विभाजन और अविश्वास बढ़ता है।
क्या अब भी उम्मीद बाकी है?
इन चुनौतियों के बावजूद उम्मीद पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। देश में आज भी अनेक स्वतंत्र पत्रकार, डिजिटल प्लेटफॉर्म और जमीनी रिपोर्टर जनहित की पत्रकारिता कर रहे हैं। खोजी पत्रकारिता अभी समाप्त नहीं हुई है और डिजिटल मीडिया ने वैकल्पिक आवाजों को मंच प्रदान किया है।
अब जागरूक दर्शक और पाठक भी तथ्य आधारित पत्रकारिता और फैक्ट चेक की मांग कर रहे हैं। सुधार के लिए मीडिया संस्थानों की आर्थिक और संपादकीय स्वतंत्रता, फेक न्यूज़ पर कठोर नियंत्रण, पत्रकार सुरक्षा कानून तथा मीडिया शिक्षा और नैतिक प्रशिक्षण आवश्यक हैं।
दर्शकों की भी जिम्मेदारी है कि वे केवल सनसनी नहीं, बल्कि तथ्य आधारित पत्रकारिता को समर्थन दें।
पत्रकारिता का स्तर गिरना केवल मीडिया का संकट नहीं, बल्कि लोकतंत्र और समाज के भविष्य का प्रश्न है। यदि मीडिया सत्ता से सवाल पूछने के बजाय केवल शोर और प्रचार का माध्यम बन जाए, तो जनता का भरोसा टूटता है। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में निष्पक्ष, जिम्मेदार और साहसी पत्रकारिता केवल आवश्यकता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अस्तित्व की शर्त है।
वैश्विक प्रेस स्वतंत्रता में भारत की स्थिति
फ्रांस स्थित संस्था ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ (RSF) द्वारा जारी ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2025’ में भारत 180 देशों में 151वें स्थान पर रहा। वर्ष 2024 में भारत 159वें और 2023 में 161वें स्थान पर था। हाल के वर्षों में कुछ सुधार अवश्य दर्ज हुआ है, लेकिन स्थिति अभी भी चिंताजनक मानी जा रही है।
रिपोर्ट में भारत को “वेरी सीरियस” यानी गंभीर प्रेस स्वतंत्रता चुनौतियों वाले देशों की श्रेणी में रखा गया है। रैंकिंग तय करने में राजनीतिक दबाव, पत्रकारों की सुरक्षा, कानूनी वातावरण, आर्थिक दबाव और सामाजिक परिस्थितियों जैसे मानकों को शामिल किया जाता है।
पड़ोसी देशों की स्थिति
भूटान — 79
नेपाल — 91
श्रीलंका — 135
भारत — 151
पाकिस्तान — 152
बांग्लादेश — 163
प्रेस स्वतंत्रता में शीर्ष देशों में नॉर्वे, एस्टोनिया और नीदरलैंड शामिल रहे, जबकि सबसे निचले स्थानों पर इरीट्रिया, उत्तर कोरिया और चीन जैसे देश रहे।
हालांकि इन रैंकिंगों को लेकर भारत में बहस भी होती रही है। कुछ विशेषज्ञ और राजनीतिक समूह आरएसएफ की कार्यप्रणाली और सर्वे पद्धति पर सवाल उठाते हैं, जबकि प्रेस स्वतंत्रता से जुड़े संगठन इसे मीडिया की वास्तविक चुनौतियों का संकेत मानते हैं।


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