खानकाहे हुसैनी में यौम ए शहादत मौला अली मनाया गया

                                        आसिफ़ कुरैशी                                      

कानपुर 23 मार्च पैगम्बर ए इस्लाम के दामाद, इस्लाम के चौथे खलीफा, शेरे खुदा मुश्किल कुशा हज़रत मौला अली (रजि०अन०) की शहादत पर खानकाहे हुसैनी हज़रत ख्वाजा सैय्यद दाता हसन सालार शाह (रह०अलै०) की दरगाह पर यौम ए शहादत मनाकर खिराजे ए अकीदत पेश की गयी।

हज़रत ख्वाजा सैय्यद दाता हसन सालार शाह (रह० अलै०) की मज़ार पर गुलपोशी इत्र केवड़ा संदल पेश किया गया उसके बाद शोरा ए कराम ने नात मनकबत पेश  की शेरे खुदा हज़रत अली की शहादत पर खिराज ए अकीदत पेश करते हुए उलेमा ए दीन ने कहा कि खामोश है तो दीन की पहचान अली है अगर बोले तो लगता है कुरान अली है। हज़रत अली की विलादत 13 रजब काबा शरीफ के अंदर हुई थी मौला अली 19 रमज़ान 40 हिज़री फज़िर की नमाज़ पढ़ाने के लिए जामा मस्जिद कुफा पहुंचे मस्जिद में मुंह के बल अब्दुर्रहमान इब्ने मुलजिम नाम का शख्स सोया हुआ था उसको मौला अली ने नमाज़ के लिए जगाया और खुद नमाज़ पढ़ाने के लिए खड़े हो गए इब्ने मुल्जिम मस्जिद के एक ख़म्भे के पीछे ज़हर में डूबी तलवार लेकर छिप गया मौला अली ने नमाज़ पढ़ानी शुरु की जैसे ही सजदे के लिए मौला अली ने अपना सिर ज़मीन पर रखा, इब्ने मुलजिम ने ज़हर में डूबी हुई तलवार से अली के सिर पर वार कर दिया तलवार की धार से ज़हर जिस्म में उतर गया 21 रमज़ानुल मुबारक 40 हिजरी को शहादत हुई आपकी उम्र 63 साल थी आपकी नमाज़े जनाज़ा आपके बड़े शहज़ादे हज़रत ए इमाम हसन ने पढ़ाई।
खादिम खानकाहे हुसैनी इखलाक अहमद चिश्ती ने कहा कि हज़रत मौला अली कहते है कि कभी कामयाबी को दिमाग मे और नाकामी को दिल मे जगह न देना क्योंकि कामयाबी दिमाग मे तकब्बुर और नाकामी दिल मे मायूसी पैदा कर देती है, नमाज़ हमारे लिए ठीक वैसे ही है जैसे एक भूखे के लिए खाना और प्यासे के लिए पानी ज़रुरी होता, नमाज़ इस्लाम के लिए ज़रुरी है। भूखों को खाना खिलाने, विधवाओं-अनाथों व पड़ोसियों की मदद करें मानवता इस्लाम का चेहरा है। हज़रत अली की जिन्दगी और उनके बताये रास्ते पर चलने व नमाज़ की पाबंदी पर ज़ोर दिया। खिताब के बाद नज़र मौलाअली सलातो सलाम पेशकर दुआ हुई दुआ में अल्लाह से मौला अली के सदके मुल्क में खुशहाली देने, नमाज़ की पाबंदी करने की दुआ की। दुआ के बाद रोज़ा इफ्तार का एहतिमाम हुआ इफ्तार बाद नमाज़ ए मगरिब नायब शहर क़ाज़ी सगीर आलम हबीबी ने अदा कराई।

नज़र व दुआ मे नायब शहर क़ाज़ी सगीर आलम हबीबी, इखलाक अहमद चिश्ती, हाफ़िज़ कफील हुसैन, हाफ़िज़ मोहम्मद असद, मुनीर अहमद कादरी, हाफिज मोहम्मद हसीब, हाफ़िज़ मुशीर अहमद, सैय्यद मोहम्मद तलहा, महबूब आलम खान, शारिक वारसी, फाज़िल चिश्ती, हाजी गौस रब्बानी, अबरार अहमद वारसी, अयाज़ अहमद चिश्ती, शाहनवाज़ कादरी, मोहम्मद शाहिद चिश्ती ,परवेज़ आलम वारसी, मोहम्मद हफीज़, इस्लाम खान, मोहम्मद अरशद, परवेज़ सिद्दीकी, मोहम्मद रफीक, फ़ैज़ अज़ीज़ी, आफताब आलम, ज़ुबैर सकलैनी, मोहम्मद फैज़ान खान, मोहम्मद रज़ा, मोहम्मद मुबीन, मोहम्मद आमिर खान, मोहम्मद शाहरुख खान, मोहम्मद अलीम अशरफी, अदनान खान, मोहम्मद आसिफ खान, मोहम्मद साजिद खान, एजाज़ रशीद, जमालुद्दीन फारुकी, जियाउद्दीन, मोहम्मद हफीज़, मोहम्मद रईस, शमशुद्दीन फारुकी, मोहम्मद जावेद, तौफीक रेनू, हबीब बादशाह, जावेद कादरी, खादिम खानकाहे हुसैनी अफज़ाल अहमद आदि थे।

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