"आपातकाल" भारतीय लोकतंत्र का एक भयावह एवं काला अध्याय
सम्पादक की कलम से
(इस लेख का मात्र मतलब हमें अपने अपने अच्छे बुरे इतिहास से अवगत कराना है ना की किसी पार्टी किसी व्यक्ति विशेष को लक्ष्य करना। पत्रकार समाज का आईना होता है और उसका यह कर्तव्य होता है कि गुजरे हुए अच्छे एवं बुरे समय / व्यवस्था को परिलक्षित करना ताकि उससे सबक लेकर भविष्य में और बेहतर किया जा सके)
आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ पर विशेष
आपातकाल की शुरुआत ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ गजब के शख्सियत एवं कभी किसी के दबाव में ना आने वाले एवं हाई कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस जगमोहन सिन्हा के तात्कालिक प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ एक फैसले को जाता है।
भारतीय राजनीतिज्ञ राज नारायण ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के द्वारा चुनाव में सरकारी मशीनरी एवं धन का दुरुपयोग को लेकर एक मुकदमा हाई कोर्ट में दायर किया था जो जस्टिस जगमोहन सिन्हा के बेंच पर सुनवायी के लिए लगाया गया मुकदमे के दौरान तात्कालिक प्रधानमंत्री के पक्ष में फैसला देने के लिए ₹500000 नगद एवं सुप्रीम कोर्ट का जज बनने का प्रलोभन दिया गया था परंतु जस्टिस जगमोहन सिन्हा कहां उस मिट्टी के बने थे जो घूस के पैसे से अपना धर्म ईमान बेच देते।
जस्टिस जगमोहन सिन्हा की अदालत में मुकदमा चला और जस्टिस सिन्हा ने राज नारायण द्वारा लगाए गए सभी आरोपों को सत्य पाया चूंकि मामला प्रधानमंत्री का था तो निश्चित ही कोई दूसरा जज होता तो बिक जाता परंतु जस्टिस जगमोहन सिन्हा ने बिना विचलित हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के कमरा नंबर 24 में 15 जून के बजाय 12 जून को ही 258 पेज के फैसले में इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध घोषित करते हुए अगले 6 वर्ष के लिए किसी भी निर्वाचित पद पर बने रहने को प्रतिबंधित कर दिया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी
आज की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तरह ही उस समय की तात्कालिक प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी हाई कोर्ट के फैसले को मानने से इनकार कर दिया और इसका नतीजा हुआ कि
तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद25 जून 1975 की रात को तात्कालिक राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के द्वारा देश में आपातकाल की घोषणा कर दी गई। आपातकाल की घोषणा के बाद दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के नागरिकों की स्वतंत्रता को ग्रहण लग गया। और इंदिरा गांधी की असवैधानिक सरकार के इस एक फैसले ने लोकतंत्र की हत्या कर दी देश में सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वाले सभी नेताओं को जेल में ठूंसा जाने लगा कानून व्यवस्था नाम की कोई भी चीज शेष नहीं रह गई थी सरकार जिसे चाहती बिना कारण बताएं डीआईआर और मीसा जैसी गंभीर धाराओं के तहत जेल में डाल दिया जाता और सजा के दौरान यातना के मामले में पुलिस ने अंग्रेजी हुकूमत को भी पीछे छोड़ दिया था लोगों को बेरहमी से पीटा जाता, उनके घाव पर मिर्च लगाया जाता, नंगे बदन करके लंबे समय तक बर्फ पर लिटाया जाता , सिगरेट व मोमबत्ती से जलाया जाता , बिजली का करंट लगाया जाता , दोनों हाथ पीछे की तरफ बांधकर पंखे आदि से घंटों तक लटका दिया जाता। कैदियों को खाने के लिए कुछ भी नहीं दिया जाता कई कई दिन उन्हें भूखा रखा जाता, मानवता शर्मसार हो रही थी और तानाशाह इन सब घटनाक्रमों से खुश थी क्योंकि उसने आपातकाल के साए में अपनी सरकार बचा ली थी। इसी बीच सरकार की एक महत्वाकांक्षी योजना नसबंदी को कार्यान्वित किया गया और जबरदस्ती पकड़ पकड़ कर लोगों की नसबंदी की जाने लगी शिकायत तो यहां तक मिली कि अविवाहित एवं नाबालिक लोगों की भी नसबंदी कर दी गई। देश में त्राहि त्राहि मची थी परंतु मौत का सा सन्नाटा छाया हुआ था परंतु मानव अधिकार की दुहाई देने वाली सभी संस्थाएं मूक वघिर हो गई थी। सर्वोच्च न्यायालय में भी देश की स्थिति पर स्वत संज्ञान लेने की ताकत नहीं बची थी।
कुछ समाचार पत्रों ने इसके खिलाफ आवाज उठाने का प्रयास किया तो प्रेस को भी सेंसर लगाकर प्रतिबंधित कर दिया गया उसकी आजादी पर कुठारागत करते हुए उसकी ताकत छीन ली गई सरकारी मीडिया का जमकर दुरुपयोग किया गया और 7000 से भी अधिक पत्रकारों को जेल में ठूँस दिया गया और उनको भी अन्य कैदियों की भांति ही प्रताड़ित किया गया।
सरकार की इस व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने के लिए किसी में हिम्मत नहीं थी परंतु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिसकी संस्थाएं पूरे भारत में छाई हुई थी उसने इस व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाना शुरू कर दिया नतीजा ये हुआ कि उनकी निष्ठा और समर्पण को कुचलने के लिए सरसंघचालक बाला साहब देवरस एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पदाधिकारियों को भी जेल में ठूँस दिया गया परंतु बाला साहब ने जेल से ही अपने स्वयंसेवकों को ऊर्जा देना शुरू किया नतीजा निकला की चारों तरफ सरकार की थू थू होने लगी।
सरकार ने अपने नैतिक एवं सामाजिक स्तर को तो तार-तार तो कर ही दिया था मजबूरी में 1977 में आम चुनाव करवाने पड़े जिसमें तात्कालिक कांग्रेस सरकार को देश की जनता ने जड़ से उखाड़ फेंका था और मोरारजी देसाई की सरकार ने देश में शासन सत्ता का कार्य संभाल लिया था इसी दौरान मोरारजी देसाई सरकार ने जे0 पी0 शाह आयोग का गठन किया जिसको आपातकाल की समीक्षा करनी थी शाह आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि उस समय जबकि आपातकाल लगाया गया था देश में हालात अच्छे थे परंतु अपनी असंवैधानिक सरकार बचाने के लिए लोगों के मूलभूत अधिकारों की हत्या कर दी गई थी। आज आपातकाल के 50 वर्ष पूरे होने पर भी जब आपातकाल की याद आती है तो उसकी कल्पना मात्र से ही लोग कांप जाते हैं।
आज जब वही कांग्रेस संविधान खतरे में है की बात करती है तो उसको शायद अपने द्वारा देश के संविधान को तोड़ मरोड़ कर लोगों के मौलिक अधिकारों पर कुठाराघात करते हुए संविधान की हत्या का ख्याल नहीं आता होगा आएगा भी क्यों ? कांग्रेस तो आज भी लोगों को जाति-पाँति, क्षेत्रवाद, हिन्दू- मुस्लिम, ठाकुर- ब्राह्मणवाद में बताकर एक बार फिर लोकतंत्र को छिन्न-भिन्न कर देना चाहती है। कांग्रेस ने तो 2024 का आम चुनाव भी भारतीय संविधान की धज्जियां उड़ाते हुए लोगों को 8500 प्रतिमाह एक लाख रुपये प्रतिवर्ष लिखित रूप में देकर भारतीय लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 123 (1बी) के खिलाफ ही लड़ा है परंतु हमारा नैतिक अधिकार बनता है कि हम साफ सुथरी छवि के व्यक्ति को ही नेता के रूप में चुनाव करें। अपना अमूल्य वोट उसी को दे जो देश हित में कार्य करना चाहता हो। क्योंकि जाति-पाँति, क्षेत्रवाद, हिन्दू- मुस्लिम, ठाकुर- ब्राह्मणवाद देश के विकास में सदैव बाधक सिद्ध हुआ है और होता रहेगा इसलिए इन सबसे ऊपर उठकर देश हित में वोट करें। हम ही अपनी बेहतर नीति और नीयत से सशक्त भारत का निर्माण कर सकते हैं।
चीन पाकिस्तान और अमेरिका जैसी ताकते भी भारत में मजबूत नेतृत्व नहीं चाहती हैं क्योंकि भारत का मजबूत नेतृत्व उसे दुनिया की नंबर एक अर्थव्यवस्था और विकसित देश में परिवर्तित होते देखना चाहता है जिससे इन देशों को खतरा महसूस होता है इसलिए चुनाव के दौरान हमारी मीडिया को खरीद लेना, हमारे राजनीतिज्ञयों को बड़ी मात्रा में विदेशी सहयोग देना यह सब इसी कड़ी में आता है। जिसका समय समय पर आरोप भी लगता रहा है।
हमें ऋषि मुनियों और देवताओं की जन्म और कर्मभूमि भारत में जन्म लेने पर गर्व महसूस होता है। हम मां भारती को सदैव समर्थ, सशक्त एवं समृद्ध देखना चाहते हैं चाहे इसके लिए हमें अपने प्राणों की आहुति ही क्यों न देना पड़े !
वंदे मातरम

















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